सोमवार, 20 फरवरी 2012

दृष्टिकोण .....

शिवरात्रि के रोज़
पत्तों और
कच्चे फलों से
विरक्त कर दिया गया
'बेल 'का पेड़ .....!


श्रद्धा ,अभिव्यक्ति का
ये रूप 
मुझे गया 
झकझोर ....


क्यूंकि ,
एक स्पर्श के बाद
पत्तों ,फलों की 
जगह थी
कचरे का डिब्बा ...!!


सोच रही हूँ .....
समय से पहले
ये मृत्यु है
जीवन की ,
या फिर
मुक्ति का
कोई सिलसिला ....!


धारणाओं ,मान्यताओं
की भूमि पर ,
जीवंत हो गया
 दृष्टिकोण ....
अन्त:करण पुकार उठा ....


जीवन जीवन होता है .....
भिन्न होता है तो
दृष्टिकोण .....
जो देता है मायने
जीवन को ........!!


(ये दृश्य मनघडंत नहीं ...हकीकत है ...)
("काव्य चेतना " से  ..)
संपादक :डॉ. धर्म स्वरुप गुप्त 
वर्ष :2009

9 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत ही बढ़िया

सादर

धनपत स्वामी ने कहा…

बहुत गहरा मामला है.....कम ही पल्ले पड़ा....

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

जीवन जीवन होता है.....
भिन्न होता है तो
दृष्टिकोण .....
जो देता है मायने
जीवन को ........!!
उचित या अनुचित.... :)
आभार आज के लिए.... :)

sushma 'आहुति' ने कहा…

प्रभावशाली प्रस्तुती....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

अलग सोच दृष्टिगत है

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सोचने को मजबूर करती पंक्तियाँ

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

अलग सोच की रचना...
शिवरात्री की बधाईयाँ.

अरूण साथी ने कहा…

या फिर
मुक्ति का
कोई सिलसिला ....!

विचारनीय एवं गंभीर कविता

आभार

इमरान अंसारी (عمران انصاری) ने कहा…

सुन्दर और सार्थक पोस्ट।